चुनावपूर्व जब समाजवादी पार्टी द्वारा अपने घोषणापत्र में ये कहा गया की सत्ता में आने पर उनकी पार्टी भारत में अंग्रेज़ी पर निर्भरता कम करेगी तबसे मैं प्रतिदिन देख रहा हूँ की समाचारपत्रों में इसपर और अंग्रेज़ी के पक्ष-विपक्ष में लेख लिखे जा रहे हैं, टिप्पणीयाँ कि जा रहीं है, हालांकि जैसी आशा है, अंग्रेज़ी के पक्ष में ही अधिकतर लेख हैं। अंग्रेज़ी तो अंग्रेज़ी, नवभारत टाइम्स जैसे कथित हिन्दी समाचारपत्रों में भी अंग्रेज़ी के पक्ष में ही लेख और टिप्पणीयां लिखी जा रहीं हैं। और २१ मई को नवभारत टाइम्स ने तो अंग्रेज़ी के पक्ष में लिखने कि सारी सीमाएँ पार कर दीं जब लेख तो लेख, उसकी भाषा तक अंग्रेज़ी थी। ऐसे समाचारपत्र दिल्ली के लोकप्रिय समाचारपत्र हैं। दिल्ली - वही शहर है ना जिसे समय-समय पर दुनिया के सबसे गंदे शहरों की श्रेणी में रखा जाता है।
इस सारी बहस के बीच मैंने भी सोचा क्यों ना अपने भी विचार चिट्ठे के माध्यम से रखें जाएं। वैसे भला हो उसका जिसने भी यह चिट्ठा जैसी अनोखी और नई चीज़ बनाई (वैसे मुझे पूरा विश्वास है की किसी विदेशी ने ही बनाई होगी, क्योंकि इंडियंस भले ही अंग्रेज़ी की कितनी ही पैरवी कर लें कोई गोरी चमड़ी के अमेरिकीयो या अंग्रेज़ों जैसी बुद्धि थोड़ी ना आ जाएगी), जिससे कोई भी अपने विचार संजाल के माध्यम से बड़ी संख्या तक लोगों में पहुँचा सकता है। (वैसे इस मामले में भी कम से कम बेचारे भारतीयों को थोड़ी बहुत अंग्रेज़ी सीखनी ही पड़ेगी, क्योंकि हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाओं के लिए तो संजाल है ही नहीं ना। कम से कम अंग्रेज़ी के पैरवीकर्ता तो यही बताना चाहते हैं कि अंग्रेज़ी सीखों क्योंकि किसी भी भारतीय भाषा में संजाल सम्भव नहीं है।)
बहराल मैं सबसे पहले तो उन लोगों को उत्तर देना चाहूँगा जो बेचारे भोले-भाले (या मूर्ख) भारतीयों को यह विश्वास दिलाने में लगे हैं की पूरी दुनिया में केवल अंग्रेज़ी ही बोली जाती है और किसी भी अन्य भाषा की कोई औकात नहीं है। ऐसे लोगो को मैं ये कहना चाहूँगा की ऐसे लोग केवल एक महीना, बस केवल एक महीना किसी भी गैर-अंग्रेज़ी भाषी विकसित देश में रहकर आएँ और फिर अपने अनुभव लोगों को बताएँ की इन देशों में अंग्रेज़ी की क्या औकात है, जैसे की मेरे पसंदीदा देश फ़्रांस, या जर्मनी, सोनिया गाँधी के मूल देश इटली, समूचा महाद्वीपीय यूरोप, रूस, या आने वाले कल की वास्तविक महाशक्ति चीन, या फिर जापान, कोरिया इत्यादि। अंग्रेज़ी के समर्थक कहते हैं की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संवाद करने के लिए अंग्रेज़ी आवश्यक है। इन लोगों को मैं ये बताना चाहूँगा की अंग्रेज़ी ना जानने के बाद भी फ़्रांस आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या अंग्रेज़ी में काम करने वाले इंडिया से लगभग २० गुणा है, यानी कि लगभग ७-९ करोड़ के बीच है।
अंग्रेज़ी ना जानने के बाद भी एक गैर-अंग्रेज़ी भाषी देश ने विश्व का सर्वप्रथम कृत्रिम उपग्रह प्रक्षेपित किया था, भूतपूर्व सोवियत संघ। अंग्रेज़ी ना जानने के बाद भी जापान इतनी बड़ी वास्तविक आर्थिक महाशक्ति बन गया। अंग्रेज़ी ना जानने के बाद भी चीन आने वाले कल की वास्तविक महाशक्ति बनने के कगार पर है जो २०२० तक सचमुच अमेरिका को चुनौती देने वाला देश बन जाएगा। तो क्या अब अंग्रेज़ी के पैरवीकारों के पास इन बातों का कोई उत्तर है की क्यों ये देश अंग्रेज़ी न जानने के बाद भी आज अमेरिका और ब्रिटेन पर भारी पड़ते हैं। वैसे १९ मई, २००९ के अंग्रेज़ी दैनिक हिन्दुस्तान टाइम्स में इन लोगों ने ये तो पढ़ ही लिया होगा कि जिस डेविड मिलिबैण्ड ने मुम्बई हमलो के लिए इंडिया की कश्मीर नीतियों को दोषी ठहराया था, उसी मिलिबैण्ड ने ये कहा की "चीन २१वीं सदी की अपरिहार्य शक्ति" है।
• तो क्या कारण है कि अंग्रेज़ी न जानने के बाद भी चीन का इतना सम्मान है और इतनी अच्छी अंग्रेज़ी जानने के बाद भी इंडियन्स को वो सहना पड़ता है जो अभी पैरिस में देखा?
• क्या कारण है कि अंग्रेज़ी जानने के बाद भी इंडिया में छपने वाले वैज्ञानिक शोधपत्रों की संख्या चीन में छपने वाले शोधपत्रों की संख्या का लगभग १/१०वां भाग है?
• क्या कारण है कि अंग्रेज़ी जानने के बाद भी इंडिया आज तक अधिकतम २,५०० किमी तक की दूरी तक ही मार करने वाला प्रक्षेपास्त्र बना पाया है, जो अपने आप में ही हँसी दिलाने वाला तथ्य है, और अंग्रेज़ी से घृणा करने के बाद भी चीन के पास पूरी दुनिया में कहीं भी मार करने वाले प्रक्षेपास्त्र हैं, जो अमेरिका तक के लिए चिंता का विषय है।
• क्या कारण है कि अंग्रेज़ी भाषा में काम करने वाला इंडिया, इज्राइल जैसे एक बहुत ही छोटे गैर-अंग्रेज़ी भाषी देश तक से बहुत से मामलों में पिछड़ा हुआ है और वह छोटा-सा देश भी अंग्रेज़ी भाषी इंडिया से वैज्ञानिक शोध में आगे है। वो इसलिए कि वहाँ के युवा अंग्रेज़ी सीखकर अमेरिकी कॉल सैंटरों में काम करने कि बजाए सम्मानजनक विषयों को चुनकर अपने देश की सच्ची सेवा करते हैं।
• क्या कारण है की अंग्रेज़ी पर इतना गर्व करने वाले इस देश ने आज तक दुनिया को कुछ नया आविष्कार करके नहीं दिखाया और गैर-अंग्रेज़ी देश एक के बाद एक आविष्कार किए जा रहे हैं?
• क्या कारण है की अंग्रेज़ी के कारण अपने सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग पर इतना गर्व करने वाले इस देश ने आज तक सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कुछ भी नया करके दुनिया को नहीं दिखाया है?
कारण यह है कि अंग्रेज़ी बोलना एक बात है और विकासोन्मुख बुद्धि होना बिल्कुल दूसरी बात। वैसे भी यदि अंग्रेज़ी इतनी ही विकास के लिए आवश्यक होती तो आज जिम्बाबे, कीनिया, बैलिज़ जैसे देश भी महा उन्नत होते, क्योंकि इन देशों की प्रमुख भाषा भी तो अंग्रेज़ी है ना।
अब बात करते हैं अंग्रेज़ी के कारण इस देश को होने वाली हानि की। सबसे बड़ी हानि तो यही है कि आज इस भाषा के कारण इस देश के लोगों को ही अपने भारतीय होने पर गर्व नहीं है। जैसा मैकाले ने चाहा था, वैसा ही ये देश बन चुका है। आज इस देश में भारतीयता को दर्शाने वाली या संबंध रखने वाली हर वस्तु लोगों के लिए उपहास का या लज्जा का विषय बन चुकि है, चाहे वह भारतीय परिधान पहनना हो (जो भारत जैसे गरम देश के लिए उपयुक्त्त भी है), चाहे वो भारतीय संस्कृति के अनुसार मिलने या बिछड़ने पर 'नमस्ते' कहना हो, चाहे वो भारतीय संस्कृति के अनुसार हाथ से खाना खाना हो (जो भारत जैसे गरम देश के लिए उपयुक्त्त भी है)। यहाँ तक की इस देश के देशभक्त टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे समाचारपत्र तो ये भी पूछते हैं कि स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस को मनाने का क्या औचित्य है। वैलेंटाइन्स डे मनाने का तो औचित्य है ना आखिर हमारा सांस्कृतिक, राष्ट्रीय पर्व है जिस दिन भारत में कुछ विशेष हुआ था। फिर लोग पूछते हैं कि आखिर हम इंडियन्स के साथ विदेशों में ऐसा व्यवहार क्यों होता है जैसा अभी पैरिस में हुआ या समय-समय पर पश्चिम के अन्य देशों में होता रहता है। सच्चाई तो यह है कि कोई भी इंडियन्स को अपने यहाँ नहीं देखना चाहता है, अमेरिका तक। वहाँ भी मरे मन से उन्हीं इंडियन्स का स्वागत होता है जो कुछ योग्यता रखते हैं अमेरिकी अर्थव्यस्था में योगदान देने की।
आज अमेरिका में जाने-माने चिकित्सक, अभियन्ता, व्यवसायी इत्यादि इस देश के मूल निवासी हैं। थोड़ा सोचिए, यदि इंडिया में अंग्रेज़ी को महत्व ना दिया गया होता तो आज ये सभी यहाँ की पिछड़ी अर्थव्यस्था में योगदान देकर कुछ पिछड़ापन कम रहे होते। कुछ महीनों पहले टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे देशभक्त समाचारपत्र ने ही यह छापा था की इंडियन मूल के अधिकांश योग्य चिकित्सक अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, और ऑस्ट्रेलिया में नौकरी कर रहें हैं (ये सभी अंग्रेज़ी भाषी देश है, किसी ने ध्यान दिया इस बात पर?), जबकि इस देश में योग्य चिकित्सकों की कमी है। वैसे ही लाखों कुशल अभियन्ता, उद्यमी भी इन्हीं अंग्रेज़ी भाषी देशों मे कार्यरत हैं। तब इस देश के लोग सुझाव देते हैं की इन लोगों के लिए एम्स, आईआईटी जैसे संस्थानों से अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद भारत में कुछ वर्ष अपनी सेवाएँ देना अनिवार्य किया जाए। ये लोग कौन होते हैं ऐसा सुझाव देने वाले? और लाख जतन कर लें इन लोगो को अंग्रेज़ी भाषी देशों में जाने से कोई नहीं रोक सकता, क्योंकि जब अंग्रेज़ी में ही काम करना है तो फिर इस देश में रुका ही क्यों जाए। मैं तो और भी देशभक्त योग्य लोगों को सुझाव दूँगा की वे भी अपने अमेरिका जाने का जुगाड़ सोचें, क्योंकि भईया काम तो अंग्रेज़ी में ही करना है। तो फिर जिस देश की भाषा ही अंग्रेज़ी है, वहीं क्यों न जाया जाए। और फिर अमेरिका में प्रसिद्धि पाने के बाद आप यहाँ भी महानायक बन जाते हैं, फिर भले ही एक फूटी कौड़ी तक की सहायता ना करें और यहाँ मुड़कर भी न देखें।
आज इस देश के किसी भी अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़े छात्र से पूछिए, उसका सपना अमेरिका या ब्रिटेन जाना ही होगा। यदि इंडिया में अंग्रेज़ी को महत्व ही न दिया गया होता तो आज ये दिन न देखने पड़ते। लेकिन अभी तो देखते रहो तमाशा। एक दिन इस देश को अमेरिका का उपनिवेश घोषित कराने तक के पक्ष में तर्क दिए जाएंगे। वैसे भी मेरी एक बात समझ में नहीं आई की जब हमने हर चीज़ में अमेरिका की ही नकल करनी है तो अमेरिका का उपनिवेश बनने में क्या बुराई है? वैसे भी उपनिवेश बनने के बाद वो हम पर ऐसा क्या लाद देंगे जो अभी हम लोगों ने अपने उपर नहीं लादा हुआ है। अंग्रेज़ी और अमेरिकी संस्कृति यहाँ पहले से ही प्रचलन में तो है ही। अभी भी अच्छी नौकरियाँ प्राप्त करने के लिए अंग्रेज़ी आना आवश्यक है, उपनिवेश बनने के बाद भी आवश्यक होगा। वैसे यह तथ्य है विचारणीय, कि नहीं?
कुछ लोग जो अंग्रेजी का सीधे तो समर्थन नहीं करते, लेकिन अपनी कुटिल बुद्धि से ये तर्क देते हैं कि उन देशों में एक ही भाषा बोली जाती है, या कि वे देश कभी अमेरिका-ब्रिटेन के गुलाम नहीं रहे इत्यादि। लेकिन इससे अधिक भ्रामक बातें और नहीं कही जा सकतीं। रूस में रूसी के अतिरिक्त २७-२८ अन्य भाषाएँ बोली जातीं है, लेकिन उन सभी को क्षेत्रीय स्तर पर आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है, केवल रूसी को ही पूरे रूस में संवाद की भाषा और राष्ट्रभाषा के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। वैसे ही स्पेन नामक देश में एक प्रांत है कैटालोनिया, और स्पेन में लगभग १७% लोग कैटलन भाषा बोलते हैं। लेकिन वे लोग तो यहाँ के तमिलों जैसा नहीं कहते की हम स्पेनी को राष्ट्रभाषा क्यों माने। सभी उस भाषा को राष्ट्रभाषा स्वीकार करते हैं। और जो ये तमिल अपनी भाषा का इतना ढिढोंरा पीटते हैं, इन लोगों से कोई पूछे की क्यों विकिपीडिया पर तमिल के लेख इतने कम है, और क्षेत्रीय भाषा होते हुए भी कैटलन के लेखों की संख्या सारी भारतीय भाषाओं की संयुक्त संख्या से अधिक हैं। कुछ लोग यह भी तर्क देते हैं की अंग्रेज़ी भारत में जोड़ने वाली और संवाद की भाषा का काम कर रही है। लेकिन यह जोड़ने वाली नहीं तोड़ने वाली भाषा है। जब किसी को भारत या भारतीयता का विरोध करना होता है तो वह हिन्दी का विरोध करता है ना कि अंग्रेज़ी का, जैसे कि उत्तर-पूर्व के अलगावादी संगठन हिन्दी गानों को सुनने पर प्रतिबंद्ध लगाते हैं, क्योंकि हिन्दी भारतीयता की परिचायक है। और अंग्रेज़ी जोड़ने वाली भाषा इसलिए बनी हैं क्योंकि इस देश के लोग स्वयं ही ऐसा चाहते हैं। वैसे भी यदि अंग्रेज़ी इतनी ही जोड़क भाषा होती तो ये राजनैतिक दल मत हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं में नहीं बल्कि अंग्रेज़ी में माँग रहे होते। वैसे भी यह इस देश के लोगों की देशभक्ति के स्तर की ओर ही संकेत करता है कि जिन लोगों ने इस देश को दो भागों में बाँटा आज उनकी भाषा राष्ट्रीय एकीकरण के लिए आवश्यक बताई और बनाई जा रही है। जय हो इंडियन्स की।
चीन से बराबरी करने के लिए इस देश के नीति-निर्माता हर प्रकार के तर्क देते हैं कि वहाँ साम्यवादी शासन है, वहाँ ऐसा है, वैसा है। लेकिन फ्रांस, जर्मनी, जापान में तो साम्यवाद नहीं है ना, और लाओस में है। कदाचित दुनिया में ऐसा कोई भी देश नहीं है जो अपनी भाषा में काम करता हो और इंडिया से पिछड़ा हो। ६० वर्षों से अंग्रेज़ी को गले लगाने के बाद भी इस देश के विकास के सारे पैमाने तीसरी दुनिया के ही किसी देश से मेल खाते हैं जैसे गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की संख्या, निरक्षर लोगों की संख्या (जो लोग साक्षर है वो भी ऐसे हैं कि क्या कहने), कुपोषण के शिकार लोगों कि संख्या, यहाँ के नर्क से भी बदतर शहर, और उनसे भी बदतर ग्राम। और जो लोग सकल घरेलू उत्पाद और ९% विकास दर का आँकड़ा दिखा रहें हैं, वे बताएँ इंडिया की प्रति व्यक्ति आय कितनी है। क्यों आई ना हँसी।
जो लोग मोबाइल क्रांति दिखा रहें हैं वे बताएँ की ६० वर्षों से अंग्रेज़ी में काम करने के बाद भी यहाँ की दूरसंचार सेवाओं की गुणवत्ता विकसित देशो के दूरसंचार सेवाओं की गुणवत्ता के सामने कहाँ ठहरती है। आई हँसी। वैसे भी यहाँ के ९०% से भी अधिक लोगों के पास जो मोबाइल फ़ोन है, वैसे तो कोई किसी विकसित देश में अपने बच्चो के लिए खिलौने के रूप में भी नहीं लेगा।
और कछ लोग तर्क दे रहें है कि आज एक झोंपड़ी में रहने वाला भी अपने बच्चों को अंग्रेज़ी विद्यालयों में पढ़ाना चाहता है। तो वो तो है ही, जिस भाषा में रोज़गार उपलब्ध कराया जाएगा लोग उसी भाषा की ओर ही तो दौड़ेंगे। वो तो यदि कल को सारा रोज़गार फ़ारसी भाषा में कर दिया जाए तो लोग फ़ारसी की ओर दौड़ेंगे। इसलिए ये कोई तर्क नहीं है। वैसे भी इस देश के चाहे कितने ही जाने-माने विद्यालय-महाविद्यालय क्यों न हों, सब के सब हैं तो अमेरिका-ब्रिटेन के लिए बड़ी संख्या में सस्ते मज़दूरों का उत्पादन करने वाले कारखाने। कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने, जिसमें स्वयं अमेरिका तक की संस्थाएं भी है, ने ये बताया है कि किसी बच्चे को यदि उसकि मातृभाषा में प्रार्थमिक शिक्षा दी जाए तो वह अधिक सीखता है। लेकिन इस देश में तो बचपन से ही बच्चों को अमेरिका-ब्रिटेन की मानसिक गुलामी करना सीखाया जाता है।
भारत के नीति निर्मातओं को भारत में वैज्ञानिक शोधों के गिरते स्तर पर चिंता हो रही है। आज के युवा गणित और विज्ञान जैसे विषयों को ना लेकर अन्य विषय ले रहें हैं और परिणाम - वैज्ञानिक शोधों का गिरता स्तर। वैसे भी लोग क्यों लें इन विषयों को? जब केवल और केवल अंग्रेज़ी सीखकर ही कोई व्यक्ति किसी अमेरिकी या ब्रिटिश बीपीओ या कॉल सैंटर में अच्छा-भला कमा सकता है तो क्या पड़ी है विज्ञान लेकर सिर खपाने की। और यदि भूले भटके कोई योग्य छात्र इन विषयों को ले भी ले तो पढ़-लिखकर उसके पास अमेरिका जाने का विकल्प तो खुला होता है ही। इसलिए इंडिया के बारे में कहा जाता है, असफल देश के सफल नागरिक। और ये नागरिक कौन हैं, जो अमेरिका में जाकर शोध कार्य कर रहें है।
इसलिए कहा जा सकता है कि इंडिया के सबसे कुशल और योग्य लोग सीधे-सीधे अमेरिका पलायन कर जाते हैं, और जो कम कुशल रह जाते हैं वे अमेरिकी कॉल सैंटरों, बीपीओ, या आईटी कम्पनीयों में काम करके खुश हो लेते हैं। जो लोग दूसरे लोगों की श्रेणी में नहीं आ पाते हैं, वो लग जाते हैं अंग्रेज़ी के पक्ष में तर्क देने जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया के स्वगातो गांगुली और इस देश के मीडिया के अन्य लोग, विशेष रूप से मानसिक गुलाम मीडिया (अंग्रेज़ी मीडिया)। तो कुल मिलाकर इंडिया के भाग्य में अंग्रेज़ी सीखकर अमेरिकियों की सेवा करना लिखा है।
और अब कुछ तथ्य जिन्हें जानकर आपको भारतीय होने पर गर्व होगा :-
1. भारतीय सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीन और लगातार बनी रहने वाली सभ्यता है और अंग्रेज़ी का इसमें कोई योगदान नहीं था।
2. अंक-प्रणाली का जन्मदाता देश है भारत और शून्य का आविष्कार आर्यभट्ट द्वारा किसी गैर-अंग्रेज़ी भाषा में किया गया था।
3. विश्व का सर्वप्रथम विश्वविद्यालय था तक्षशिला जो ७०० ईसापूर्व में स्थापित हुआ था और उस समय के ज्ञात विश्व के लगभग १०,००० छात्र यहाँ गैर-अंग्रेज़ी भाषाओं में शिक्षा ग्रहण करते थे। आज के इंडिया के उच्च शिक्षण संस्थान अंग्रेज़ी में शिक्षा देने के बाद भी विश्व स्थर पर कहाँ ठहरते हैं, बताने कि आवश्यकता नहीं है।
4. संस्कृत जो की सभी भारतीय-यूरोपीय भाषाओं की जननी है जाहिर सी बात है एक गैर-अंग्रेजी भाषा है। फोर्ब्स पत्रिका के जुलाई १९८७ संस्करणानुसार यह अभिकलन यंत्र (संगणक) सॉफ्टवेयर के लिए सबसे उप्युक्त भाषा भी है। और हिन्दी भाषा में इसी संस्कृत से अधिकांश शब्द लिए गए हैं और यह भी संस्कृत के समान उप्युक्त रूप से देवनागरी लिपि में लिखी जाती है।
5. आयुर्वेद जोकि विश्व का प्राचीनतम आयुर्विज्ञान है, चारक द्वारा आज से २,५०० से भी अधिक वर्ष पूर्व गैर-अंग्रेज़ी भाषा में विकसित किया गया था।
6. आधुनिक काल में जब इस देश में अंग्रेज़ी का इतना चलन है इंडिया को एक अति निर्धन और पिछड़े देश के रूप में चित्रित किया जाता है, लेकिन १७वीं सदी तक जब यह देश भारत था, यह दुनिया का सबसे धनी देश था, जब अंग्रेज़ी का यहाँ अस्तित्व तक नहीं था।
7. नौकायन की कला आज से ६,००० वर्ष पूर्व सिन्धु नदी में विकसित हुई थी जब अंग्रेज़ी का यहाँ कोई अस्तित्व नहीं था।
8. शतरंज का आविष्कार भारत में गैर-अंग्रेज़ी भाषा में हुआ था।
9. बीजगणित, त्रिकोणमिति और कैल्कुलस का विकास भारत में किसी गैर-अंग्रेज़ी भाषा में हुआ था। द्विघात समीकरणों का विकास श्रीधराचार्य द्वारा ११वीं सदी में किसी गैर-अंग्रेज़ी भाषा में किया गया था।
10. दशमलव प्रणाली का विकास भारत में किसी गैर-अंग्रेज़ी भाषा में हुआ था।
तो देखा आपने कि अंग्रेज़ी के बिना भारत कितना महान देश था।
अब देखें पिछले ६२ वर्षों में अंग्रेज़ी में हुआ विकास:-
1. विश्व की कुल निरक्षर, भूखी, कुपोषित, निर्धन जनसंख्या का सर्वाधिक भाग अंग्रेज़ी भाषी इंडिया में है।
2. इंडिया कि सरकार के अनुसार ही अंग्रेज़ी भाषी इंडिया में ७७% लोग प्रति व्यक्ति प्रतिदिन २० रू से कम में अपना जीवन बसर कर रहें हैं। यह संख्या जापान जैसे गैर-अंग्रेजी भाषी महाविकसित देश कि कुल जनसंख्या का लगभग ७ गुणा है।
3. विश्व बैंक के एक प्रतिवेदनानुसार अंग्रेज़ी भाषी इंडिया की जलापूर्ति प्रणाली दुनिया में सबसे गंदी है। (१२२ देशों की सूची में तीसरा सबसे गंदा) इंडिया की यात्रा पर आए भूतपूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति क्लिंटन तो पीने का पानी तक अमेरिका से लाए थे।
4. अंग्रेज़ी भाषी इंडिया गरीबी के मामले में बस उप-सहारा अफ़्रीका से ही उपर है।
5. अंग्रेज़ी भाषी इंडिया में जहाँ अंग्रेज़ी जानने वालों की संख्या विश्व में दूसरे या तीसरे स्थान पर है, का मानव विकास संसाधन के मामले में स्थान १२० से नीचे है। अपनी हँसी रोकिए।
6. अंग्रेज़ी भाषी इंडिया में प्रतिवर्ष हजाओं कृषक आत्महत्या करते हैं जिसे हिन्दू धर्म में महापाप मान गया है। आखिर वे विवश हैं। बेचारे विदेशी भाषा तो जानते नहीं की नर्क जैसे शहरों में जाकर कोई अच्छी नौकरी ही कर लें और अपना ऋण चुका लें। (और फिर इन विवश कृषकों के मत लेने के लिए चुनावी मौसम में ऋण माफी जैसे लुभावने वायदे किए जाते हैं।)
7. अंग्रेज़ी भाषी इंडिया की पुलिस और सेना ऐसे हथियारों से युक्त है जिनसे १५वीं सदी के युद्ध भी नहीं जीते जा सकते और ९% की विकासदर और दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी सेना होने का ढिंढोरा पीटने वाले इस देश का लगभग इतना भूभाग दूसरे देशों के अधीन है कि जितने में इज्राइल जैसे न जाने कितने देश बन जाएँगे। मैं बात कर रहा हूँ अधिकृत कश्मीर और अक्साई चिन की, जबकि आज से २,००० वर्ष पूर्व अंग्रेज़ी न जानते हुए भी मगध और गुप्त साम्राज्य भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर तक फैले हुए थे। जबकि आज इंडियन सेना में तक अच्छा पद प्राप्त करने के लिए अंग्रेज़ी ज्ञान आवश्यक है। तो ऐसे में इंडियन सेना में सैनिको की कमी नहीं होगी तो और क्या होगा। जब अंग्रेज़ी ही आवश्यक है तो कोई क्यों ना अमेरिकी सेनाओं में घुसने का जुगाड़ करे, इससे वहाँ की नागरिकता मिलने में भी आसानी होती है। और जो अमेरिका नहीं जा पाते वे अंग्रेजी जानने के कारण इस योग्य तो होते ही है कि किसी अमेरिकी कॉल सैंटर में अमेरिकीयों की समस्याओं का उत्तर दे और गाली खाते रहें, और फिर जब अमेरिकी कहें कि वाह कितनी अच्छी अंग्रेज़ी बोलते हैं इंडियन्स, तो और गर्व से अंग्रेज़ी की पैरवी करें और कहें की इंडिया इसलिए आउटसोर्सिंग का गढ़ है क्योंकि हम अच्छी अंग्रेज़ी जानते हैं, और जो सच्चाई से अवगत कराए उन्हे पिछड़ा और विकास विरोधी बताया जाए, जैसे कि आउटसोर्सिंग का कथित गढ़ ना होने से यूरोप के देश विकास के मामले में अंग्रेज़ी भाषी इंडिया से पिछड गए हैं। इसलिए इंडियन वायुसेना मुझे ये बताए कि कोई क्यों इसमें भर्ती हो जब वहाँ भी अंग्रेज़ी मे काम करना है और किसी कॉल सैंटर में भी, और देश भक्ति तो खैर इस देश के लोगो में क्या कहने। पहली बात तो जो सच्चा देश भक्त होगा वह हर मामले में भारतीयता को ही आगे रखेगा।
8. १ अरब २० करोड़ की जनसंख्या वाला यह देश यदि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है भी तो कोई आश्चर्य नहीं हैं, लेकिन अंग्रेज़ी भाषी इंडिया और सबसे बड़े लोकतंत्र का दंभ भरने वाले इस देश में कोई भी व्यक्ति बिना चुनाव लड़े प्रधानमंत्री बन सकता है। जब बिना चुनाव लड़े ही प्रधानमंत्री बना है तो क्या लाभ है सबसे बड़े लोकतंत्र होने का ढिंढोरा पीटने का? प्रश्न है कि लोकतंत्र कितना सफ़ल और सुदृड़ है। इसलिए इसे पढ़ने वाले भी अपना भाग्य आजमा कर देख सकतें हैं प्रधानमंत्री बनने के लिए। इससे अच्छा तो चीन है कम से कम साम्यवादी शासन है भी तो इतना विकास भी तो कर लिया है उन्होंने अपनी भाषा में।
9. जहाँ आज से ५,००० वर्ष से भी पहले विकसित हुई हड़प्पा सभ्याता में अंग्रेज़ी न जानने के बाद भी आज के इंडिया से लाख गुणा बेहतर नगर-निगम प्रणाली थी, वहीं आज के अंग्रेज़ी भाषी इंडिया में लोग सड़कों, गलियों में गंदगी फैलाते है, जहाँ-तहाँ पेशाब करते हैं, थूकते है, जबकि इस देश को गर्व है (जिस तथ्य पर शर्म होना चाहिए) की यहाँ इतनी बड़ी संख्या में लोग अंग्रेज़ी जानते हैं।
तो कुल मिलाकर देखा जाए तो इस देश के पतन के लिए यदि कोई कारण सबसे अधिक उत्तरदायी है तो वो है अंग्रेज़ी को आवश्यकता से अधिक महत्व देना।
और अब बात की क्यों ये सभी देश आगे हैं, अंग्रेज़ी की उपेक्षा कर के भी और फिर भी अमेरिकी इनका सम्मान करतें है और इंडियन्स का नहीं :-
• चीन ने पिछले वर्ष हुए ओलम्पीयाई खेलों में इतने पदक इसलिए जीते क्योंकि वहाँ उनके खिलाड़ीयों के खेल प्रक्षिक्षण पर ध्यान दिया गया नाकि उनकी अंग्रेज़ी बोलने की योग्यता पर। और खेल महाशक्ति भी अब वे हैं ही।
• चीन वैज्ञानिक महाशक्ति बनने की ओर भी तेज़ी से अग्रसर है क्योंकि वहाँ उनके वैज्ञानिकों के उचित प्रक्षिक्षण पर ध्यान दिया जाता है नाकि उनके अंग्रेज़ी बोलने की योग्यता पर।
• जापान जैसा एक छोटा-सा देश विद्युतीय उपकरन और वाहन उद्योग में अग्रणी हैम क्योंकि वहाँ उनके अभियन्ताओं के उचित प्रक्षिक्षण पर ध्यान दिया जाता है नाकि उनके अंग्रेज़ी बोलने की योग्या पर। यदि योग्य नहीं हैं तो नौकरी पर नहीं रखा जाएगा चाहे कितना ही इंडियन्स के जैसे मुँह हिला-हिला कर अंग्रेज़ी बोल लें।
• जापान दूसरे विश्व युद्ध के बाद इतनी तेज़ी से वास्तविक आर्थिक महाशक्ति बन गया, क्योंकि वहा राष्ट्र निर्माणोन्मुख शिक्षा पर ध्यान दिया गया नाकि अमेरिका और ब्रिटेन के लिए सस्ते दामों पर बड़ी संख्या में क्लर्क तैयार करने की शिक्षा पर।
• जर्मनी-जापान-फ़्रांस जैसे देशों में आज रेलगाडीयाँ ३००-३६० की गति पर दौड़ती हैं, क्योंकि उन लोगों ने अपना आधारभूत ढाँचा सुधारने पर ध्यान दिया नाकि अमेरिका-ब्रिटेन के लिए कुशल मज़दूरों की सेना तैयार करने पर। ९% की विकास दर और इतनी बड़ी संख्या मे अंग्रेज़ी जानने वालों की संख्या होने का ढिंढोरा पीटने वाला ये देश अब क्यों नहीं बना लेता इतनी तीव्रगामी रेलगाड़ीयाँ? बनाते तो तब जब आज से ५०-६० वर्ष पहले अंग्रेज़ी बोलने की कला के बजाए अपने अभियन्ताओं की वास्तविक योग्यता पर ध्यान दिया होता।
और क्या फर्क पड़ता है यदि स्पेन-फ्रांस-नॉर्वे जैसे देश तथाकथित सू पौ महाशक्ति नहीं है तो, या फिर दक्षिण कोरिया ने आज तक कोई उपग्रह प्रक्षेपित नहीं किया या फिर कि कोई पुर्तगाली मूल का नागरिक ओबामा की मंत्रीपरिषद में नहीं है या कोई रूसी अमेरिका की किसी बड़ी सी कम्पनी का सीईओ नहीं। उनका एक आम नागरिक यहाँ के करोड़पति से अच्छा जीवन बसर करता है और किसी देश के लिए यह आवश्यक है ना कि अमेरिका में जाकर कथित झंड़े गाड़ना और इस देश के लोग तो इन लोगों पर ऐसे गर्व करते हैं जैसे की अमेरिका में उनकी पूछ इसलिए है कि वो इंडिया से हैं। अमेरिका में भी उन लोगों को रखा जाता है जो योग्य हैं ना कि किसी के जन्म के मूल देश के आधार पर।
कुछ निजी अनुभव
अभी हाल ही में एक व्यक्ति मेरे पास आया। उसे कोई पत्र आया हुआ था। दरसल पत्र किसी बिजली कम्पनी का था और विदेशी भाषा में था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या लिखा है, तो मैंने उसे कहा की आपको नहीं लगता है की यदि ये पत्र आपकी भाषा में होता तो आपको पढ़ने मे सरल भी होता और उत्तर देने में या आगे की कार्यवायी करने में भी। उसने कहा हाँ होता तो, लेकिन इस देश में अंग्रेज़ी जानना ज़रूरी है ना, नहीं तो जैसे कि आप किसी योग्य है हीं नहीं। उसने कहा की यदि में यह जान लेने के बाद की इसमें क्या लिखा है पत्र का उत्तर हिन्दी में दे भी दूँ तब भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है की यह पत्र हिन्दीं में होने के कारण पढ़ा भी जाएगा या नहीं। मेरे एक मित्र ने मुझसे एक बार कहा की इस देश में चाहे आपके पास कितनी ही योग्यता क्यों ना हो, यदि आप को अंग्रेजी नहीं आती तो आप अच्छी नौकरी प्राप्त नहीं कर सकते। मेरे एक परिचित का तो यह निजी अनुभव भी रहा है। वे एक बार कहीं नौकरी के लिए साक्षात्कार देने के लिए गए और उनका अनुभव यह रहा की एक अन्य व्यक्ति जिससे वो नौकरी दे दी गई थी से उन्होंने कुछ बातचीत की और हर मामले में वह उनसे कम ही योग्य निकला, लेकिन उस व्यक्ति की सबसे बड़ी योग्यता यह थी की वह उस भाषा को बोल सकता था जिसे बोलने वालों ने २०० वर्षों तक उसी के पूर्वजों के सिरो पर डंडे बरसाए। और यदि कोई योग्य व्यक्ति अंग्रेज़ी में भी पारंगत हो तो फिर भला उसे अमेरिका जाने से क्या परहेज हो सकता है। तो भला कोई कैसे ये सोच सकता है ऐसा देश कभी चीन-अमेरिका से बराबरी करेगा?
वैसे यह मेरा भी अनुभव रहा है। संजाल पर कई स्थानों पर जब अपने विचार किसी वेबसाइट पर लिखने के लिए कहा जाता है तो मैं हिन्दी में लिखने का प्रयास करता हूँ, लेकिन या तो वो विचार जमा ही नहीं हो पाते या फिर जमा हो भी जाएँ तो प्रकाशित नहीं होते। आज कई विदेशी साइटें तो हिन्दी में उपलब्ध हैं लेकिन इस देश की ये देश भक्त साइटें कभी भी हिन्दी में उपलब्ध नहीं कराई जाएँगी। वैसे भी एक दिन इन्हीं हरकतों के कारण विदेशियों की लोकप्रियता और बढ़ेगी और आम भारतीय फिर से किसी विदेशी शक्ति को अपना मुखिया बनाने के लिए आगे बढ़ेगा। इसलिए अभी भी समय है इस देश में अंग्रेज़ी की पैरवी करने वालों को सुधर जाना चाहिए। आज आप दुनिया के किसी भी सम्मानजनक देश की राष्ट्रीय वेबसाइट खोल लीजिए, वह जाहिर सी बात है वहाँ की राष्ट्रभाषा में तो होगी ही, साथ ही साथ अंग्रेज़ी के अतिरिक्त अन्य विदेशी भाषाओं में भी होगी, लेकिन यहाँ तो अन्य भाषाएँ तो छोड़िए, हिन्दी तक में भी बहुत सी सरकारी वेबसाइटें उपलब्ध नहीं हैं (अन्य भारतीय भाषाओं की तो खैर छोड़िए)
अंत में मैं ये कहना चाहूँगा कि यह लेख उन लोगों का विरोध करने के लिए लिखा गया है, जो इस देश में अंग्रेज़ी की पैरवी करते है जैसे कि कथित हिन्दी समाचारपत्र नवभारत टाइम्स, और अंग्रेज़ी दैनिक टाइम्स ऑफ इंडिया। अब तक इस देश में हिन्दी भाषी लोगों और समर्थकों को नीचा दिखाया जाता रहा है, मैंने सोचा क्यों ना अंग्रेज़ी के पैरवीकारों को उनकी असली औकात दिखाई जाए और भारतीयों को ऐसे छिपे देशद्रोहियों की वास्तविकता बताई जाए।